ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस अंतिम सूर्योदय की गाथा सुनकर आज भी हृदय में एक विचित्र सा कंपन होता है, जहाँ धर्म और कर्तव्य की सीमाएं धुंधली पड़ गई थीं।
भीष्मपर्व · अध्याय 63
पितामह की घटती शक्ति