ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र की रक्त रंजित भूमि पर खड़े आचार्य द्रोण का मन शस्त्रों के कोलाहल के बीच भी किसी अदृश्य मंथन से जूझ रहा था।
भीष्मपर्व · अध्याय 95
आचार्य का आंतरिक द्वंद्व