ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस तेरहवें दिन की संध्या न केवल युद्ध की थकान लेकर आई थी, बल्कि वह धर्म और अधर्म के द्वंद्व का एक ऐसा अध्याय थी, जहाँ गुरु और शिष्य के संबंधों की मर्यादा भी परीक्षा की कसौटी पर खड़ी थी।
द्रोणपर्व · अध्याय 12
विनाश के बादल और अंत की आहट