ग्रंथसार
वीरता के उस स्वर्णिम अध्याय की बात ही कुछ और है, जब सोलह वर्ष के एक बालक ने अकेले ही समूचे कौरव साम्राज्य को चुनौती दे डाली थी।
द्रोणपर्व · अध्याय 122
अभिमन्यु का अद्भुत पराक्रम