ग्रंथसार
सूतजी की वाणी में कुरुक्षेत्र की उस संध्या का वर्णन है, जिसने न केवल एक योद्धा को, बल्कि धर्म के पूरे युग को विचलित कर दिया था।
द्रोणपर्व · अध्याय 132
गुरु-हत्या का शोक और कोलाहल