ग्रंथसार
गुरुदेव, पराजय के उपरांत क्या केवल शरीर का अंत ही दंड है, या उससे भी कठोर कोई नियति शेष रहती है?
द्रोणपर्व · अध्याय 155
पराजित का अपमान और पतन