ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस अंतिम रण-क्षण का स्मरण करते ही आज भी हृदय कांप उठता है, जहाँ गुरु की निश्छल साधना और शिष्य की प्रतिशोध अग्नि का मिलन हुआ था।
द्रोणपर्व · अध्याय 158
आचार्य का अंतिम प्रस्थान