ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र की धूल शांत हो चुकी थी, किंतु उन धधकती स्मृतियों की गूंज आज भी ऋषियों के आश्रमों में सुनाई देती है।
द्रोणपर्व · अध्याय 173
महायुद्ध का उपसंहार