ग्रंथसार
नियति का चक्र जब घूमता है, तो बड़े-बड़े वीर भी विवश होकर केवल तमाशा देखते रह जाते हैं, देवरात!
द्रोणपर्व · अध्याय 51
पहिए का दुर्भाग्य