ग्रंथसार
क्या कर्तव्य का पालन ही जीवन का चरम सत्य है, या धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी मर्यादाओं का परित्याग ही अनिवार्य हो जाता है?
द्रोणपर्व · अध्याय 60
द्रोणाचार्य की हताशा