ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र के उस भीषण चौदहवें दिन की संध्या का वह सन्नाटा आज भी इतिहास के पन्नों में धृष्टद्युम्न के पश्चात्ताप की गूँज लिए हुए है।
द्रोणपर्व · अध्याय 65
धृष्टद्युम्न का पश्चात्ताप