ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र की धूल में दबे उस पहिये के साथ ही नियति का चक्र भी पूर्ण हो गया था, मुनिवर।
द्रोणपर्व · अध्याय 84
अंतिम प्रहार की आहट