ग्रंथसार
क्या भाग्य का कोई चक्र हमारे कर्मों से स्वतंत्र होता है, या हम स्वयं ही अपने पतन की नींव रखते हैं?
द्रोणपर्व · अध्याय 99
कर्ण के रथ का पहिया धंसना