ग्रंथसार
गुरुदेव, जब नियति अपना जाल बुनती है, तो क्या एक महायोद्धा का पुरुषार्थ भी अंततः मौन हो जाता है?
कर्णपर्व · अध्याय 57
नियति का पहिया