ग्रंथसार
आश्रम की शांत संध्या में सूतजी ने जब महाभारत के उस अंतिम प्रहर की कथा सुनाई, तो लगा जैसे कुरुक्षेत्र का सन्नाटा हमारे ही समीप आ गया हो।
कर्णपर्व · अध्याय 67
शांत अस्त