ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र की धूल शांत हो चुकी थी, किंतु रणभूमि की उस नीरवता में भी त्याग और पराक्रम की गूँज आज भी सुनाई देती है।
कर्णपर्व · अध्याय 94
रणभूमि की गूँज