युधिष्ठिर की चिन्ता और भीम-अर्जुन का पराक्रम-संकल्प
आश्रम की शांत संध्या में, जब दीप प्रज्वलित हुए, तब सूतजी ने धर्मराज युधिष्ठिर की उस दुविधा का द्वार खोला, जहाँ एक ओर राज्य की महत्त्वाकांक्षा थी और दूसरी ओर अपनों का मोह।
हिन्दी कथा
युधिष्ठिर की चिन्ता और भीम-अर्जुन का पराक्रम-संकल्प
सभापर्व · अध्याय 16
युधिष्ठिर की चिन्ता और भीम-अर्जुन का पराक्रम-संकल्प