ग्रंथसार
राजसूय यज्ञ की अग्नि शांत हो चुकी थी, किंतु उस दिव्य तेज की गूँज आज भी इतिहास के पन्नों में अमर है।
सभापर्व · अध्याय 43
राजसूय यज्ञ की पूर्णता और राजाओं की विदाई