ग्रंथसार
क्या भाग्य ही सब कुछ निर्धारित करता है, या मनुष्य की मति भ्रष्ट होना उसके स्वयं के अहंकार का परिणाम है?
सभापर्व · अध्याय 56
विदुर की चेतावनी और इन्द्रप्रस्थ प्रस्थान