ग्रंथसार
अहंकार जब तक हृदय में निवास करता है, तब तक मनुष्य विजय के शिखर पर होकर भी भीतर से रिक्त ही रहता है।
सौप्तिकपर्व · अध्याय 15
मणि का समर्पण