ग्रंथसार
अंधेरी रात के सन्नाटे में जब काल स्वयं पहरा दे रहा हो, तब नियति के क्रूर विधान को कौन टाल सकता है?
सौप्तिकपर्व · अध्याय 2
शिव का पहरा