ग्रंथसार
अंधकार से भरी उस भीषण रात्रि की गूँज आज भी इतिहास की गहराइयों में किसी सिसकी की भाँति सुनाई देती है।
सौप्तिकपर्व · अध्याय 4
पांचाली के पुत्रों का अंत