ग्रंथसार
कुरुक्षेत्र की धूल शांत हो चुकी थी, किंतु उन अंतिम क्षणों की गूँज आज भी मानवता को आईना दिखाती है।
शल्यपर्व · अध्याय 36
अंतिम प्रस्थान की प्रतीक्षा