ग्रंथसार
काल के इस अनंत चक्र में, जहाँ भाग्य और पुरुषार्थ का निरंतर द्वंद्व चलता है, वहीं मनुष्य के अस्तित्व का रहस्य छिपा है।
शान्तिपर्व · अध्याय 108
काल और नियति का स्वरूप