ग्रंथसार
सत्य और संयम की धारा ही वह अमृत है, जो जीवन के शुष्क मरुस्थल को सदा के लिए हरा-भरा कर देती है।
शान्तिपर्व · अध्याय 124
आत्म-संयम और सत्य का मार्ग