ग्रंथसार
क्या इंद्रियों का दमन ही जीवन का चरम लक्ष्य है, या उनसे पार पाकर आत्म-साक्षात्कार करना ही वास्तविक पुरुषार्थ है?
शान्तिपर्व · अध्याय 128
इंद्रिय-विजय का महात्म्य