ग्रंथसार
दान का अर्थ केवल अपनी संपदा का त्याग करना नहीं, अपितु अहंकार को मिटाकर मानवता के प्रवाह में स्वयं को विसर्जित कर देना है।
शान्तिपर्व · अध्याय 130
दान का महत्व