ग्रंथसार
जीवन के उतार-चढ़ाव में विचलित न होना ही वास्तविक विजय है, जैसे कि शांत समुद्र अपनी मर्यादा कभी नहीं छोड़ता।
शान्तिपर्व · अध्याय 132
जीवन में समत्व भाव