ग्रंथसार
क्या बाहरी युद्धों की समाप्ति ही शांति का द्वार है, या असली कुरुक्षेत्र हमारे भीतर ही कहीं धधक रहा है?
शान्तिपर्व · अध्याय 14
मानवीय द्वंद्व के मूल