ग्रंथसार
क्या काल की गति के आगे मनुष्य का पुरुषार्थ मात्र एक भ्रम है, या हमारे कर्म ही नियति को बदलने का सामर्थ्य रखते हैं?
शान्तिपर्व · अध्याय 145
काल और नियति का स्वरूप