ग्रंथसार
क्या कर्मों के अटूट बंधन से मुक्ति का कोई मार्ग संभव है, या हम सब सदा के लिए अपने ही किए के कारागार में बंद हैं?
शान्तिपर्व · अध्याय 146
कर्मों का फल और आत्म-चिंतन