ग्रंथसार
क्या राजभवन की चकाचौंध के बीच रहकर भी कोई व्यक्ति अंतर्मन से वैरागी हो सकता है, यही जानने के लिए देवरात ने सूतजी के चरणों में अपनी जिज्ञासा रखी।
शान्तिपर्व · अध्याय 147
त्याग और ज्ञान का मार्ग