ग्रंथसार
गुरुवर, मनुष्य की यह वाणी कभी शीतल अमृत बन जाती है तो कभी दहकते अंगारे, भला इस पर अंकुश कैसे लगाया जाए?
शान्तिपर्व · अध्याय 150
वाणी का संयम