ग्रंथसार
नदी के शांत तट पर बैठे सूतजी ने जब अपनी आंखें खोलीं, तो देवरात के मन में उठे जिज्ञासा के ज्वार को उन्होंने एक दृष्टि में ही पढ़ लिया।
शान्तिपर्व · अध्याय 225
जीव का स्वरूप