ग्रंथसार
काल की अनंत धारा में बहते हुए भी जो अपने कर्तव्य के तट पर अडिग रहता है, वही वास्तव में जीवन की सार्थकता को समझ पाता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 231
काल की गति