ग्रंथसार
क्या काल का चक्र वास्तव में मनुष्य के संकल्पों से परे है, या हमारे कर्म ही उस चक्र की धुरी बनते हैं?
शान्तिपर्व · अध्याय 241
काल और नियति का स्वरूप