ग्रंथसार
दान का अर्थ केवल वस्तु देना नहीं, अपितु अहंकार को विसर्जित कर स्वयं को परमात्मा के सम्मुख समर्पित करना है।
शान्तिपर्व · अध्याय 279
दान की महिमा