ग्रंथसार
मन की चंचलता पर विजय ही वह दुर्ग है, जिसे जीत लेने पर संसार की कोई भी बाधा मनुष्य को विचलित नहीं कर सकती।
शान्तिपर्व · अध्याय 283
आत्म-नियंत्रण का पथ