ग्रंथसार
समय की धारा में बहते मनुष्य को काल का रहस्य समझाते हुए सूतजी ने देवरात के मन की उलझन को शांत कर दिया।
शान्तिपर्व · अध्याय 285
काल और नियति का स्वरूप