ग्रंथसार
नदी के तट पर अस्त होते सूर्य की आभा में सूतजी ने देवरात के हृदय में आत्मज्ञान का बीज बोया।
शान्तिपर्व · अध्याय 288
आत्म-साक्षात्कार का पथ