ग्रंथसार
मुक्ति का मार्ग वन के एकांत में नहीं, अपितु जीवन के महासमर में कर्तव्य का पालन करते हुए स्वयं को पहचानने में निहित है।
शान्तिपर्व · अध्याय 304
मुक्ति का वास्तविक स्वरूप