ग्रंथसार
धर्म के जटिल चक्रव्यूह में जब मन उलझ जाए, तो गुरु की वाणी ही वह दीप है जो कर्तव्य का मार्ग प्रशस्त करती है।
शान्तिपर्व · अध्याय 310
सदाचार और मर्यादा का स्वरूप