ग्रंथसार
नर्मदा के तट पर जब सूर्यास्त की लालिमा शांत हुई, तो सूतजी ने देवरात के मन के अंधकार को मिटाने के लिए परमात्मा के उस सत्य को वाणी दी, जिसे सुनकर स्वयं धर्मराज युधिष्ठिर का मोह भंग हो गया था।
शान्तिपर्व · अध्याय 314
ईश्वरीय चेतना का स्वरूप