ग्रंथसार
आश्रम की शांत संध्या में जब दीप प्रज्वलित हुए, तब सूतजी ने देवरात को नारायण की उस अनंत महिमा से परिचित कराया, जो काल के प्रवाह को भी स्थिर कर देती है।
शान्तिपर्व · अध्याय 333
नारायण की महिमा