ग्रंथसार
नदी का जल जैसे सागर में विलीन होकर अपना नाम-रूप खो देता है, वैसे ही ज्ञानी का मन परमात्मा में मिलकर स्वयं को ब्रह्म ही अनुभव करता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 334
परम ब्रह्म का स्वरूप