ग्रंथसार
क्या ईश्वर को केवल बुद्धि के तराजू में तौलकर पाना संभव है, या इसके लिए हृदय के किसी और ही द्वार को खटखटाना होगा?
शान्तिपर्व · अध्याय 337
प्रभु का परमतत्व स्वरूप