ग्रंथसार
सदाचार के बीज ही नियति के वृक्ष का आधार बनते हैं, जिसे समझकर ही एक राजा प्रजा का रक्षक बन पाता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 342
सदाचार और सत्कर्म का फल