ग्रंथसार
नदी के शांत तट पर बैठे सूतजी ने जब अपनी आँखें खोलीं, तो देवरात के हृदय में उपजे राज्य-नीति के प्रश्नों को उन्होंने मौन में ही पढ़ लिया।
शान्तिपर्व · अध्याय 48
राज्य की शक्ति और रक्षा