ग्रंथसार
नयमीषारण्य के घने वनों में जब शिष्य देवरात ने राजधर्म का मर्म जानने की जिज्ञासा व्यक्त की, तब सूतजी ने भीष्म पितामह के उपदेशों का ऐसा सागर बहाया कि राजत्व का अर्थ ही बदल गया।
शान्तिपर्व · अध्याय 57
प्रजापालन और राजधर्म