ग्रंथसार
नयी सुबह की किरणों के साथ कुरुक्षेत्र की उस धर्मधरा का बोध जगा, जहाँ आज भी राजाओं के कर्तव्यों का स्वर गूँजता है।
शान्तिपर्व · अध्याय 61
राज्य-संचालन में आपत्तियाँ